सुखी परिवार के सात लक्षण

 

परमेश्‍वर चाहता है कि हमारा परिवार सुखी हो। आज हम सुखी परिवार के सात लक्षण देखेंगे, लेकिन इसका मतलब यह नही की लक्षण सात ही है। जैसे जैसे आप और नई बातें सीखेंगे आप इसमें जोडते जाएं।
निम्‍न बिन्‍दुओं पर गौर करें। संक्षिप्‍त में विवरण भी दिए गएं है।
1. स्‍नेह
परिवार में स्‍नेह भावना आवश्‍यक है। परमेश्‍वर चाहता है कि परिवार ही स्‍नेह का सर्वोत्‍तम स्‍थान बनें। जब परिवार में इसकी कमी होती है तो सदस्‍य घर से बाहर स्‍नेह की तालाश करते है जिसके कारण परिवार की मजबूती ज्‍यादा नही रह पाती है।
2. समझ
आपसी मतभेद के बावजूद एक दूसरे को समझने का प्रयास करना अतिआवश्‍यक है। कई बार सदस्‍य एक दूसरे पर दोश लगाने लगते है कि वे समझते नही या ये समझते नही। दोश लगाने से कुछ भला नही होता। समझ प्रेम और विश्‍वास का बंधन है।
3. समर्पण
परिवार मे लक्ष्‍य एवं समर्पण की भावना होना चाहिए। समर्पण आपसी हो और लक्ष्‍य पर केंद्रित हो। यहोशु को याद करे जिसने कहा कि वह अपने घराने समेत ईश्‍वर की सेवा करेगा। समर्पण एवं कर्तव्‍य निष्‍ठा साथ साथ चलते है।
घर के अध्‍यक्ष का परिवार के लिए कुछ लक्ष्‍य रखें है। ईश्‍वर भी जगत में पारिवारिक उददेश्‍य रखता है। उददेश्‍य समर्पण को निर्धारित करता है।
4. स्‍वास्‍थ्‍य
ईश्‍वर न केवल दैवीय चंगाई देता हे बल्कि दैवीय स्‍वास्‍थ भी प्रदान करता है। लेकिन हमें इसके विषय में बेपरवाही नही होना चाहिए। खानपान, रहन सहन, रख रखाव इन सारी बातों पर स्‍वास्‍थ केंद्रित ध्‍यान धरें।
5. सम्‍मान
एक दूसरे को सम्‍मान दें। त्रिएक परमेश्‍वर हमारे लिए आदर्श है। पिता पुत्र और पवित्रात्‍मा के बीच जिस प्रकार आपसी सम्‍मान की भावना है, वही भावना परिवार के सम्‍मान को भी बढ़ाता है।
6. सलाह
सलाह एवं सम्‍मति परिवार में हो तो व्‍यक्ति यहां वहां भटकने से बच सकते है। भजन 1 के अनुसार परमेश्‍वर चाहता है कि धर्मशास्‍त्र हमारे घर के बुनियाद बन जाए। अकसर टीवी और सिनेमा बुरी सलाह से मन को भरमा देते है। परन्‍तु जो घर वचन पर स्‍थापित है वह़ बना रहेगा।
7. सहभागिता
यदि सहभागिता न हो, आपसी वार्तालाप न हो तो फिर परिवार टूटने लगता है। अंग्रजी में कहावत है “The family that prays together stays together” अर्थात जो परिवार मिलकर आराधना करता है वह मिलकर साथ रहता है। परमेश्‍वर के साथ हमारी सहभागिता हो और यह एक दूसरे के साथ की सहभागिता का सही संदर्भ उत्‍पन्‍न करेगा।

मसीही आचार संहिता

परिवार में
माता-पिता के लिए निर्देश
1. अपने बच्‍चे को प्रोत्‍साहित करें
हे बच्चेवालों, अपने बालकों को तंग न करो, न हो कि उन का साहस टूट जाए (कुलु 3:21)
उनके साहस को न तोडें। उन्‍हें उदास, हताश, चिडचिडाछोटा, नीचा, या घटिया मेहसूस होने न दें।
उन्‍हें अच्‍छी अच्‍छी वस्तुऐं दें, जैसा हमारा पिता परमेश्‍वर भी हमें प्रेम से सारी वस्‍तुऐं देता है। (लूका 11:11-13)
2. जब बच्‍चे जवान है तभी उन्‍हें अनुशासन सिखादें ।
जबतक आशा है तो अपने पुत्र को ताड़ना कर, जान बूझकर उसका मार न डाल (नीति 19:18) अनुशासन की शिक्षा देना प्रेम की ही निशानी है ( इब्रा 12: 6:10)
3. प्रभु की शिक्षा, और चितावनी देते हुए, उन का पालन- पोषण करो।
और हे बच्चेवालों अपने बच्चों को रिस न दिलाओ परन्तु प्रभु की शिक्षा, और चितावनी देते हुए, उन का पालन- पोषण करो।। (इफि 6:4) 
– उन्‍हें शिक्षा दें
लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिस में उसको चलना चाहिये, और वह बुढ़ापे में भी उस से न हटेगा। (नीति 22:6)
और बालकपन से पवित्र शास्त्रा तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है। (2तिम 3:15)
– उन्‍हें अनुशासन में रखें
जो बेटे पर छड़ी नहीं चलाता वह उसका बैरी है, परन्तु जो उस से प्रेम रखता, वह यत्न से उसको शिक्षा देता है। (नीति 13:24)
लड़के के मन में मूढ़त बन्धी रहती है, परन्तु छड़ी की ताड़ना के द्वारा वह उस से दूर की जाती है। (नीति 22:15)
लड़के की ताड़ना न छोड़ना; क्योंकि यदि तू उसका छड़ी से मारे, तो वह न मरेगा। तू उसका छड़ी से मारकर उसका प्राण अधोलोक से बचाएगा। (नीति 23:13)
छड़ी और डांट से बुद्धि प्राप्त होती है, परन्तु जो लड़का योंही छोड़ा जाता है वह अपनी माता की लज्जा का कारण होता है। (नीति 29:15)
अपने घर का अच्छा प्रबन्ध करता हो, और लड़के- बालों को सारी गम्भीरता से आधीन रखता हो।  (जब कोई अपने घर ही का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो परमेश्वर की कलीसिया की रखवाली क्योंकर करेगा) (1तिम 3:4-5)
4. बच्‍चों को तंग  न करें, उन्‍हे रिस न दिलाये, न उनके साहस को तोडें (कुलु 3:21, इफि 6:4)
5. अपने घर के लिए प्रबंध करें
पर यदि कोई अपनों की और निज करके अपने घराने की चिन्ता न करे, तो वह विश्वास से मुकर गया है, और अविश्वासी से भी बुरा बन गया है। (1तिम 5:8)
वह अपने घराने के चालचलन को ध्यान से देखती है, और अपनी रोटी बिना परिश्रम नहीं खाती। (नीति 31:27)
बच्‍चों के लिए निर्देश
1. सब बातों में अपने अपने माता- पिता की आज्ञा का पालन करो, क्योंकि प्रभु इस से प्रसन्न होता है।(कुलु 3:20)
2. प्रभु में अपने माता पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है।(कुलु 6:1)
3. अपनी माता और पिता का आदर करें ताकि तुमहारा भला हो, और तुम धरती पर बहुत दिन जीवित रहों। (इफि‍ 6:2-3)
4. उनकी सेवा करें। अपने माता- पिता आदि को उन का हक देना सीखें, क्योंकि यह परमेश्वर को भाता है। (1तिम 5:4)
माता पिता की आज्ञा न माननेवालों पर परमेश्‍वर का कोप उतरता है (रोम 1:30,32)
विवाहित दम्‍पतियों के लिए निर्देश
1. दोनों एक तन के समान एक रहें।
इस कारण पुरूष अपने माता पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक तन बनें रहेंगे। (उत्‍प 2:24) इसका यह मतलब भी है कि माता पिता या सांस ससुर दम्‍पति की एकता में हस्‍तक्षेप न करें।
2. वे एक दूसरे से अलग न हो। वि‍वाह के वाचा के प्रति‍ वि‍श्‍वासयोग्‍य रहें।
तुम में से कोई अपनेी जवानी की स्त्री से विश्वासघात न करे। क्योंकि इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यह कहता है, कि मैं स्त्री- त्याग से घृणा करता हूं। (मलाकी 2:15, 16)
सो व अब दो नहीं, परन्तु एक तन हैं: इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।  
तुम एक दूसरे से अलग न रहो; परन्तु केवल कुछ समय तक आपस की सम्मति से कि प्रार्थना के लिये अवकाश मिले, और फिर एक साथ रहो, ऐसा न हो, कि तुम्हारे असंयम के कारण शैतान तुम्हें परखे ।  (1कुरु 7:5)
3. वे एक दूसरे का हक पूरा करें।
पति अपनी पत्नी का हक्क पूरा करे; और वैसे ही पत्नी भी अपने पति का।  (1कुरु 7:3)
4. वे एक दूसरे के आधीन रहें।
पत्नी को अपनी देह पर अधिकार नहीं पर उसके पति का अधिकार है; वैसे ही पति को भी अपनी देह पर अधिकार नहीं, परन्तु पत्नी को।  (1कुरु 7:4)
 और मसीह के भय से एक दूसरे के आधीन रहो। (इफि  5:21)
5. वे आपसी सम्‍मति से और परमेश्‍वर की इच्‍छा की समझ के साथ सब कुछ करें ।  (1कुरु 7:5)
6. विवाह के सम्‍बन्‍ध को पवित्र बनाए रखें।
विवाह सब में आदर की बात समझी जाए, और बिछौना निष्कलंक रहे; क्योंकि परमेश्वर व्यभिचारियों, और परस्त्रीगामियों का न्याय करेगा ।  (इब्रा 13: 4)
पतियों के लिए निर्देश
1. अपनी पत्‍नी का सिर अथवा मुखिया और स्‍वामी वह हो।
पति पत्नी का सिर है जैसे कि मसीह कलीसिया का सिर है।  (इफि 5:23)
जैसे सारा इब्राहीम की आज्ञा में रहती और उसे स्वामी कहती थी ।  (1पत 3:6)
2. मसीह को अपना सिर अथवा मुखिया और स्‍वामी जानें।
हर एक पुरूष का सिर मसीह है: और स्त्री का सिर पुरूष है: और मसीह का सिर परमेश्वर है ।  (1कुरु 11:3)
3. जिस प्रकार मसीह कलीसिया से प्रेम करता है वैसे ही पति भी अपनी पत्‍नी से प्रेम करें ।
हे पतियों, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया।  (इफि 5 :25)
इसी प्रकार उचित है, कि पति अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखता है, वह अपने आप से प्रेम रखता है। क्योंकि किसी ने कभी अपने शरीर से बैर नहीं रखा बरन उसका पालन- पोषण करता है, जैसा मसीह भी कलीसिया के साथ करता है इसलिये कि हम उस की देह के अंग हैं।   (इफि 5 :28-30)
हे पतियो, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, और उन से कठोरता न करो।   (कुलु 3:19)
4. अपनी पत्‍नी का आदर करें।
हे पतियों, तुम भी बुद्धिमानी से पत्नियों के साथ जीवन निर्वाह करो और स्त्री को निर्बल पात्रा जानकर उसका आदर करो, यह समझकर कि हम दोनों जीवन के वरदान के वारिस हैं, जिस से तुम्हारी प्रार्थनाएं रूक न जाएं ।   (1 पत 3:7)
पत्नियों के लिए निर्देश
1. अपने पति के लिए एक ऐसा सहायक बनें जो उस से मेल खाए। (उत्‍प 2:18)
2. अपने पति के ऐसे आधीन रहें जैसे प्रभु के। (इफि 5:22)
पर जैसे कलीसिया मसीह के आधीन है, वैसे ही पत्नियां भी हर बात में अपने अपने पति के आधीन रहें। (इफि 5:24)
3. अपने पति के जीते जी उस से बन्‍धी रहें।
क्योंकि विवाहिता स्त्री व्यवस्था के अनुसार अपने पति के जीते जी उस से बन्धी है।   (रोम 7:2)
यदि पति के जीते जी वह किसी दूसरे पुरूष की हो जाए, तो व्यभिचारिणी कहलाएगी।   (रोम 7 :3)
4. संयमी हो। (तीतुस 2:5)
5. वह पतिव्रता हो। (तीतुस 2:5)
6. वह घर का कारबार करनेवाली हो। (तीतुस 2:5)
7. वह भली स्‍वभाव की हो।
वह अपने जीवन के सारे दिनों में उस से बुरा नहीं, वरन भला ही व्यवहार करती है।   (नीति 31:12)
और संयमी, पतिव्रता, घर का कारबार करनेवाली, भली और अपने अपने पति के आधीन रहनेवाली हों, ताकि परमेश्वर के वचन की निन्दा न होने पाए। (तीतुस 2:5)
इसलिये कि यदि इन में से कोई ऐसे हो जो वचन को न मानते हों, तौभी तुम्हारे भय सहित पवित्र चालचलन को देखकर बिना वचन के अपनी अपनी पत्नी के चालचलन के द्वारा खिंच जाएं। (1पत 3:2)
8. बुद्धिमान हो।
हर बुद्धिमान स्त्री अपने घर को बनाती है, पर मूढ़ स्त्री उसको अपने ही हाथों से ढा देती है । (नीति 14:1)
वह बुद्धि की बात बोलती है, और उसके वचन कृपा की शिक्षा के अनुसार होते हैं। (नीति 31:26)
9 . पति का भय मानने वाली  हो।
पत्नी भी अपने पति का भय माने। (इफि 5:33)
10. अपने पति और बच्चों से प्रीति रखें। (तीतुस 2:4)
11. अपने पति की ओर ही लालसा हो। (उत्‍प 3:16)
12. अपने पति से सीखें ।
यदि वे कुछ सीखना चाहें, तो घर में अपने अपने पति से पूछें। (1कुरु 14:35)
13 . परिश्रमी हो (नीति 31:12-30)
ऐसे मूढ़ स्त्रियों के समान न हो जो- घर घर फिरकर आलसी होना सीखती है, और केवल आलसी नहीं, पर बकबक करती रहती और औरों के काम में हाथ भी डालती हैं और अनुचित बातें बोलती हैं। (1तिम 5:13)
14. शान्‍त स्‍वभाव के हो।
बरन तुम्हारा छिपा हुआ और गुप्त मनुष्यत्व, नम्रता और मन की दीनता की अविनाशी सजावट से सुसज्जित रहे, क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि में इसका मूल्य बड़ा है। (1पत 3:4)
झगड़ालू और चिढ़नेवाली पत्नी के संग रहने से जंगल में रहना उत्तम है। (नीति 21:19)
स्त्री को चुपचाप पूरी आधीनता में सीखना चाहिए। (1तिम 2:11)
15. दिखावटी सिंगार करने वाली न हो।
और तुम्हारा सिंगार, दिखावटी न हो, अर्थात् बाल गूंथने, और सोने के गहने, या भांति भांति के कपड़े पहिनना। (1पत 3:3)
वैसे ही स्त्रियां भी संकोच और संयम के साथ सुहावने वस्त्रों से अपने आप को संवारे; न कि बाल गूंथने, और सोने, और मोतियों, और बहुमोल कपड़ों से, पर भले कामों से। क्योंकि परमेश्वर की भक्ति ग्रहण करनेवाली स्त्रियों को यही उचित भी है। (1तिम  2:9-10)
16 . घर में किसको स्‍वागत करना और किसको नही, इस बात का समझ रखने वाली हो।
यह इसलिए क्‍योंकि संसार में कई ऐसे झुठे शिक्षक और अपने आप को परमेश्‍वर के सेवक बताने वाले भेडियां है जो कलीसिया को तोडने के लिए घर घर को भडकानें की कोशीश करते है।
इन्हीं में से वे लोग हैं, जो घरों में दबे पांव घुस आते हैं और छिछौरी स्त्रियों को वश में कर लेते हैं, जो पापों से दबी और हर प्रकार की अभिलाषाओं के वश में हैं। और सदा सीखती तो रहती हैं पर सत्य की पहिचान तक कभी नहीं पहुंचतीं। और जैसे यन्नेस और यम्ब्रेस ने मूसा का विरोध किया था वैसे ही ये भी सत्य का विरोध करते हैं: ये तो ऐसे मनुष्य हैं, जिन की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है और वे विश्वास के विषय में निकम्मे हैं। (2‍तिम 3:6-9)
यदि कोई तुम्हारे पास आए, और यही शिक्षा न दे, उसे न तो घर मे आने दो, और न नमस्कार करो। क्योंकि जो कोई ऐसे जन को नमस्कार करता है, वह उस के बुरे कामों में साझी होता है। (2यूह 1:10,11)
17 . भरोसेमन्‍द और विश्‍वासयोग्‍य हो।
उसके पति के मन में उसके प्रति विश्वास है। (नीति 31:10)
कलीसिया में
विश्‍वासियों के लिए निर्देश
1. प्रार्थना में, शिक्षा में, और संगति में लगे रहे (प्रेरित 2:42; कुलु 4:12, प्रेरित 12:5, याकूब 5:15)
2. एक दूसरे से प्रेम रखें (रोम 12:10)
3. एक दूसरे का आदर करें (रोम 12:10)
4. एक दूसरे की मदद और सहायता करें (रोम 12:13; 1कुरु 16:1; गल 6:6)
5. पहनुाई और अतिथि सत्‍कार करने वाले हो (रोम 12:13; 1तिम 3:2)
6. एक दूसरे के दुखों को जानने वाले हो (रोम 12:15; गल 6:5; रोम 15:1-7)
7. नम्र हो (रोम 12:6)
8. भलाई करें (रोम 12:17)
9. उन्‍नति के वचन बालें (इफि 4:29)
10. एक दूसरे को संभालें (गल 6:1,2)
11. वफादार रहें (रोम 12:17; इफि 4:15, 25)
12. वचन द्वारा समझाने के लिए तत्‍पर रहें (2तिम 4:2)
13. एक दूसरे के आधीन रहें (1पत 5:5)
14. एक दूसरे के सहने वाले बनें (कुलु 3:13)
15. एक दूसरे को क्षमा करने वाले बनें (कुलु 3:13)
संसार में
नौकरी करने वालों के लिए
1. अपने मालिक का आदर करें (1तिम 6:1,2)
2. अपने मालिक के प्रति आज्ञाकारी रहें
जो लोग शरीर के अनुसार तुम्हारे स्वामी हैं, अपने मन की सीधाई से डरते, और कांपते हुए, जैसे मसीह की, वैसे ही उन की भी आज्ञा मानो। और मनुष्यों को प्रसन्न करनेवालों की नाई दिखाने के लिये सेवा न करो, पर मसीह के दासों की नाई मन से परमेश्वर की इच्छा पर चलो। और उस सेवा को मनुष्यों की नहीं, परन्तु प्रभु की जानकर सुइच्छा से करो।
और जो कुछ तुम करते हो, तन मन से करो, यह समझकर कि मनुष्यों के लिये नहीं परन्तु प्रभु के लिये करते हो। (इफि 6:5, 6-8; कुलु 3:23-25)
-भय के साथ
– एक मन से
– जैसी की मसीह क आज्ञाकारी है
– मनुष्‍यों को खुश करने के लिए नही
– लेकिन मसीह के सेवक होने के नाते
– परमेश्‍वर की इच्‍छा को पूरा करते हुए
अर्थात, यदी कोई बात वचन के विरुद्ध है तो उसे न करें (घूस, रिश्‍वत, भ्रष्‍टाचार से दूर रहें)
2. उलटकर जवाब न दें।
अपने अपने स्वामी के आधीन रहें, और सब बातों में उन्हें प्रसन्न रखें, और उलटकर जवाब न दें। (तीतुस 2:9)
3. विश्‍वासयोग्‍य रहें ।
चोरी चालाकी न करें; पर सब प्रकार से पूरे विश्वासी निकलें, कि वे सब बातों में हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर के उपदेश की शोभा दें। (तीतुस 2:10)
4. आधीन रहें।
हे सेवकों, हर प्रकार के भय के साथ अपने स्वामियों के आधीन रहो, न केवल भलों और नम्रों के, पर कुटिलों के भी। क्योंकि यदि कोई परमेश्वर का विचार करके अन्याय से दुख उठाता हुआ क्लेश सहता है, तो यह सुहावना है। क्योंकि यदि तुम ने अपराध करके घूसे खाए और धीरज धरा, तो उस में क्या बड़ाई की बात है? पर यदि भला काम करके दुख उठाते हो और धीरज धरते हो, तो यह परमेश्वर को भाता है। (1पत 2:18-20)
स्‍वामियों के लिए निर्देश
1. धमकियां न दें। गाली  गलौच न करें।
हे स्वामियों, तुम भी धमकियां छोड़कर उन के साथ वैसा ही व्यवहार करो, क्योंकि जानते हो, कि उन का और तुम्हारा दानों का स्वामी स्वर्ग में है, और वह किसी का पक्ष नहीं करता। (इफि 6:9)
2. न्‍याय और ठीक ठीक व्‍यवहार करें।
उनके मजदूरी या वेतन में अन्‍याय न करें। उनका शोषण न करें, क्‍योंकि परमेश्‍वर कठोर और अन्‍यायी लोगों को निर्दोष नही छोडेगा।
हे स्वामियों, अपने अपने दासों के साथ न्याय और ठीक ठीक व्यवहार करो, यह समझकर कि स्वर्ग में तुम्हारा भी एक स्वामी है। (कुलु 4:1)
एक दूसरे पर अन्धेर न करना, और न एक दूसरे को लूट लेना। और मजदूर की मजदूरी तेरे पास सारी रात बिहान तक न रहने पाएं। (लैव 19:13)
संसार के प्रति हमारा सामान्‍य कर्तव्‍य
1. संसार में शान्ति के लिए प्रार्थना करें (1तिम 2:1-4)
2. आदर के साथ सबसे व्‍यवहार करें।
सब का आदर करो, भाइयों से प्रेम रखो, परमेश्वर से डरो, राजा का सम्मान करो। (1पत 2:17)
3. बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उन की चिन्ता किया करो। (रोम 12:17)
4. जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। (रोम 12:18)
5. मसीह की गवाही का जीवन जीयें ।
ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, (जिन के बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों की नाईं दिखाई देते हो) (फिलि 2:15)
6. जो कुछ तुम चाहते हो, कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उन के साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्तओं की शिक्षा यही है।। (मत्ति 7:11)
7. किसी के कर्जदार न हो।
इसलिये हर एक का हक्क चुकाया करो, जिस कर चाहिए, उसे कर दो; जिसे महसूल चाहिए, उसे महसूल दो; जिस से डरना चाहिए, उस से डरो; जिस का आदर करना चाहिए उसका आदर करो। आपस के प्रेम से छोड़ और किसी बात में किसी के कर्जदार न हो; क्योंकि जो दूसरे से प्रेम रखता है, उसी ने व्यवस्था पूरी की है। (रोम 13:7-8) 
अधिकारियों के प्रति
1. उनका आदर करो (रोम 13:7)
2. उनके आधीन रहो (रोम 13:1, 1पत 2:13-16)
3. उनके लिए प्रार्थना करो (1तिम 2:2-4)

परमेश्‍वर को सदा धन्‍य कहना।

परमेश्‍वर को सदा धन्‍य कहना।

(भजन 103: 1-5)
हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे!
हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना।
वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है,
वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करूणा और दया का मुकुट बान्धता है,
वही तो तेरी लालसा को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है, जिस से तेरी जवानी उकाब की नाईं नई हो जाती है।।
अपने मन को आदेश दें की मन परमेश्‍वर को धन्‍य कहें
क्‍योंकि मन सब से अधिक धोखा देने वाला है
कयोंकि मन परमेश्‍वर को धन्‍यवाद देने से पीछे हट जाता है
और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने अपने मन में प्रभु के साम्हने गाते और कीर्तन करते रहो। और सदा सब बातों के लिये हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्वर पिता का धन्यवाद करते रहो (इफि 5:19-20)
मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ (कुलु 3:16)
परमेश्‍वर को धन्‍य कहना है,
सम्‍पूर्णता से. जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे! यदि कुछ हममे ऐसा है जो उसके पवित्र नाम को धन्‍य नही कह सकता तो आज सम्‍पूर्ण समर्पण की आवश्‍यक्‍ता है।
स्‍मरण करके. उसके किसी उपकार को न भूलना। अपने आप को उसकी भलाई याद दिलाने से स्‍वयं में गवाही होता है जिससे विश्‍वास मजबूत होता है। याद रखें कि वह हमारे सिर पर करूणा और दया का मुकुट बान्धता है। जब निराशा और अविश्‍वास का बादल छा जाएं तो अपने मुकुट को याद रखें।
परमेश्‍वर की आशीषें जो हमें मिलि है
क्षमा – वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता
स्‍वास्‍थ्‍य, सेहत – तेरे सब रोगोंको चंगा करता है
सुरक्षा – वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है
संतुष्टि – वही तो तेरी लालसा को उत्तम पदार्थोंसे तृप्त करता है
वह हमें सम्‍पूर्ण रीति से आशीषित करता है। इसलिए आईए हम सम्‍पूर्ण जीवन से और उसके भलाईयों को स्‍मरण करते हुए उसे धन्‍य कहते रहेा

प्रार्थना करना

सरल शब्‍दों में प्रार्थना परमेश्‍वर से एक पिता के रुप में बातें करना ही है। यह एक वार्तालाप है।
प्रार्थना मनुष्‍य का सबसे म‍हान सौभाग्‍य है क्‍योंकि प्रार्थना में वह बिना किसी रोक के सीधे परम प्रधान परमेश्‍वर से अपने पिता के समान बात कर सकता है जो राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है।
प्रार्थना आत्मिक जीवन का श्‍वांस है। अर्थात यदी हम प्रार्थना करना छोड देते है तो हम आत्मिक श्‍वांस लेना छोड देते है, जिसका मतलब यह है कि हमारी आत्मिक जीवन की हानी हो रही है। परन्‍तु जो पवित्र आत्‍मा में प्रार्थना करता है उसकी आत्मिक उन्‍नती होती है (यहूदा 20, 1कुरु 14:4)
हम कभी भी किसी भी वक्‍त प्रार्थना कर सकते है। सामान्‍यत: तो हमें निरंतर प्रार्थना करते रहना चाहिए (1थिस्‍स 5:17)
परन्‍तु प्रार्थना के कुछ नियम है:
1. हम विश्‍वास से मांगे।
पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है (याकूब 1:6)
और जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्वास से मांगोगे वह सब तुम को मिलेगा (म‍त्ति 21:22)
2. हम परमेश्‍वर की इच्‍छा की समझ रखकर मांगे। (रोम 8:27)
और हमें उसके साम्हने जो हियाव होता है, वह यह है; कि यदि हम उस की इच्छा के अनुसार कुछ मांगते हैं, तो हमारी सुनता है(1यूह 5:14)
तुम मांगते हो और पाते नहीं, इसलिये कि बुरी इच्छा से मांगते हो, ताकि अपने भोग विलास में उड़ा दो (याकूब 4:3)
3.  हमारा जीवन धर्मी होना चाहिए। अगर ऐसा नही है तो पहले मन फिराएं और अपना रिश्‍ता परमेश्‍वर के साथ सही कर लें।
इसलिये यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहां तू स्मरण करे, कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के साम्हने छोड़ दे। और जाकर पहिले अपने भाई से मेल मिलाप कर; तब आकर अपनी भेंट चढ़ा (मत्ति 5:23,24)
हम जानते हैं कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनता परन्तु यदि कोई परमेश्वर का भक्त हो, और उस की इच्छा पर चलता है, तो वह उस की सुनता है (यूह 9:31)
धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है। (याकूब 5:16)
वैसे ही हे पतियों, तुम भी बुद्धिमानी से पत्नियों के साथ जीवन निर्वाह करो और स्त्री को निर्बल पात्रा जानकर उसका आदर करो, यह समझकर कि हम दोनों जीवन के वरदान के वारिस हैं, जिस से तुम्हारी प्रार्थनाएं रूक न जाएं (1पत 3:7)
यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा (यूह 15:7)
4. हम पवित्रात्‍मा में प्रार्थना करें। (यहूदा 20, 1कुरु 14:4)
इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते, कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए; परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये बिनती करता है।और मनों का जांचनेवाला जानता है, कि आत्मा की मनसा क्या है? क्योंकि वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार बिनती करता है (रोम 8:26-27)
5. हम नम्रता से धन्‍यवाद और निवेदनों के साथ प्रार्थना करें।
इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे (इब्रा 4:16)।
वह तो और भी अनुग्रह देता है; इस कारण यह लिखा है, कि परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है (याकूब 4:6)
किसी भी बात की चिन्ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं (फिलि 4:6)
उस ने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊंचे शब्द से पुकार पुकारकर, और आंसू बहा बहाकर उस से जो उस को मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और बिनती की और भक्ति के कारण उस की सुनी गई (इब्रा 5:7)
6. हम हर समय और हर जगह प्रार्थना करें।
हर जगह पुरूष बिना क्रोध और विवाद के पवित्र हाथों को उठाकर प्रार्थना किया करें (1तिम 2:8)
निरन्तर प्रार्थना मे लगे रहो (1थिस्‍स 5:17)
7. जागते हुए प्रार्थना करें
इसलिये जागते रहो और हर समय प्रार्थना करते रहो (लूका 21:36)
8. जब तक न मिले विश्‍वास के साथ प्रार्थना में लगे रहे।
क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढ़ता है, वह पाता है। और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा (मत्ति 7:7)
नित्य प्रार्थना करना और हियाव न छोड़ना चाहिए (लूका 18:1)
एलियाह भी तो हमारे समान दुख- सुख भोगी मनुष्य था; और उस ने गिड़गिड़ा कर प्रार्थना की; कि मेंह न बरसे; और साढ़े तीन वर्ष तक भूमि पर मेंह नहीं बरसा। फिर उस ने प्रार्थना की, तो आकाश से वर्षा हुई, और भूमि फलवन्त हुई” (याकूब 5:17-18)
और उस ने अपने सेवक से कहा, चढ़कर समुद्र की ओर दृष्टि कर देख, तब उस ने चढ़कर देखा और लौटकर कहा, कुछ नहीं दीखता। एलिरयाह ने कहा, फिर सात बार जा। सातवीं बार उस ने कहा, देख समुद्र में से मनुष्य का हाथ सा एक छोटा आदल उठ रहा है। एलिरयाह ने कहा, अहाब के पास जाकर कह, कि रथ जुतवा कर नीचे जा, कहीं ऐसा न हो कि नू वर्षा के कारण रूक जाए” (1 राजा 18:43)
9. यीशु मसीह के नाम से प्रार्थना करें।
और जो कुछ तुम मेरे नाम से मांगोगे, वही मैं करूंगा कि पुत्र के द्वारा पिता की महिमा हो। यदि तुम मुझ से मेरे नाम से कुछ मांगोगे, तो मैं उसे करूंगा (यूह 14:13, 14)
किसके लिए प्रार्थना करें
1. अपनी आवश्‍यकताओं के लिए। (मत्‍ति 6 :11)
2. अपने आत्मिक अगुवों के लिए। (इब्रा 13:18, 1थिस्‍स 5:25)
3. सारे पवि‍त्र लोगों के लिए। (इफि 6:18)
4. सरकार और अधिकारियों के लिए। (1तिम 2:1)
5. सुसमाचार प्रचार के लि‍ए। (मत्ति 9:38, कु‍लु 4:3)
6. बीमारों के लि‍ए। (याकूब 5: 1 4
7. एक दूसरे के लि‍ए। (याकूब 5:16)


प्रभु की सेवा करना

परमेश्‍वर का वचन हमें सिखाता है कि हर कलीसिया परमेश्‍वर का मंदिर है (1कुरु.3:16) और हर एक विश्‍वासी परमेश्‍वर के सम्‍मुख में एक याजक है (1पत.2:9)। यीशु मसीह ने सिखाया कि परमेश्‍वर की उपासना और सेवा ही हमारा जीवन का सर्वोच्‍च कर्तव्‍य है (मत्ति 4:10)।
1. सेवक का मन –परमेश्‍वर की सेवा में एक सेवक का मन रखना प्राथमिक योग्‍यता है। जिस प्रकार प्रभु यीशु मसीह का एक सेवक का स्‍वभाव है वैसा ही हमारा भी स्‍वभाव होना चाहिए।
जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो। जिस ने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। बरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। (फिलि 2:5-8)
2. आज्ञाकारिता और विश्‍वासयोग्‍यता – फिर आवश्‍यक है कि प्रभु के सेवक होने के नाते एक विश्‍वासी सम्‍पूर्ण रीती से आज्ञाकारी और विश्‍वासयोग्‍य होना चाहिए (मत्ति 24:45; 1कुरु 4:2)। इसके साथ साथ यह भी अति आवश्‍यक है कि विश्‍वासी अपने जीवन में पवित्रता का अनुकरण करना चाहिए।
3.पवित्रता –क्योंकि परमेश्वर ने हमें अशुद्ध होने के लिये नहीं, परन्तु पवित्र होने के लिये बुलाया है (1थिस्‍स 4:7)।
बड़े घर में न केवल सोने- चान्दी ही के, पर काठ और मिट्टी के बरतन भी होते हैं; कोई कोई आदर, और कोई कोई अनादर के लिये। यदि कोई अपने आप को इन से शुद्ध करेगा, तो वह आदर का बरतन, और पवित्र ठहरेगा; और स्वामी के काम आएगा, और हर भले काम के लिये तैयार होगा। (2तिम.2:20,21)
4. अनुशासन –अनुशासन से तात्‍पर्य वह जीवन जिसपर परमेश्‍वर का वचन शासन करता हो और वह आलस और अभिलाषाओं का गुलाम न हो। वह नियमबद्ध हो और सेवा कार्य में उत्‍कृष्‍टता को ही अपना लक्ष्‍य बना लिया हो।  जब कोई योद्धा लड़ाई पर जाता है, तो इसलिये कि अपने भरती करनेवाले को प्रसन्न करे, अपने आप को संसार के कामों में नहीं फंसाता। फिर अखाड़े में लडनेवाला यदि विधि के अनुसार न लड़े तो मुकुट नहीं पाता। (2तिम 2:4)
सेवा के दो पहलू
परमेश्‍वर की सेवा के दो पहलू है
1. उपासना: यह परमेश्‍वर के सन्‍मुख प्रार्थना, आराधना, और उपवास सहित किया जाता है।
वे उपवास सहित प्रभु की उपासना कर रहे थे (प्रेरित 13:2)
2. सेवा कार्य: यह परमेश्‍वर के आज्ञानुसार लोगों के बीच में वचन की शिक्षा, सुसमाचार का प्रचार, कलीसिया की व्‍सवस्‍था का देखरेख करना, इत्‍यादी का कार्य है।
कलीसिया में सेवा
कलीसिया में सेवा का विधान यह है कि सब कुछ क्रमानुसार हो। और सब कुछ प्रभु यीशु मसीह  के द्वारा नियुक्‍त अगुवों की आधीनता में हो जिन्‍हें प्रभु यीशु मसीह ने कलीसिया में उन्‍नति और सेवा के लिए नि‍युक्‍त  किया  है।
अपने अगुवों की मानो; और उनके अधीन रहो, क्योंकि वे उन की नाई तुम्हारे प्राणों के लिये जागते रहते, जिन्हें लेखा देना पड़ेगा, कि वे यह काम आनन्द से करें, न कि ठंडी सांस ले लेकर, क्योंकि इस दशा में तुम्हें कुछ लाभ नहीं। (इब्रा 13: 17)
प्रभु यीशु मसीह ने विश्‍वक रूप से कलीसिया द्वारा सेवा हेतु 5 सेवक पदों को निर्धारित किया है जो सामन्‍यत: पूर्ण कालीन है। ये सेवकाई पदवियां विशेष अधिकार युक्‍त है जो इनकी बुलाहट में निहित है। इनकी नियुक्ति मनुष्‍यों से नही परन्‍तु परमेश्‍वर से है।
और उस ने कितनों को भविष्यद्वकता नियुक्त करके, और कितनों को सुसमाचार सुनानेवाले नियुक्त करके, और कितनों को रखवाले और उपदेशक नियुक्त करके दे दिया। जिस से पवित्र लोग सिद्ध जो जाएं, और सेवा का काम किया जाए, और मसीह की देह उन्नति पाए। जब तक कि हम सब के सब विश्वास, और परमेश्वर के पुत्र की पहिचान में एक न हो जाएं, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएं और मसीह के पूरे डील डौल तक न बढ़ जाएं। ताकि हम आगे को बालक न रहें, जो मनुष्यों की ठग- विद्या और चतुराई से उन के भ्रम की युक्तियों की, और उपदेश की, हर एक बयार से उछाले, और इधर- उधर घुमाए जाते हों। (इफि  4:11-14)
इन 5 सेवक पदों को अपने हाथ के 5 उंगलियों के सहारे समझ सकते है।
प्रेरित – अंगूठे के समान है जो सभी उंगलियों को छू सकता है। अर्थात उसका अधिकार और सेवा का सम्‍बन्‍ध सभी सेवकाईयों से है। प्रेरित कलीसियाओं पर अधिकार रखते है और मसीही शिक्षा में कलीसिया का निर्माण करते है। प्रेरित के पास कलीसिया को अनुशासित करने का अधिकार है। (2कुरु 13:10) और उनके पास प्रेरिताई के चिन्‍ह भी पवित्रात्‍मा से दिये हुए होते है (2कुरु 12:12)।
भविष्यद्वकता –तर्जनी के समान है जो बातों को प्रगट करता है और परमेश्‍वर के संदेश को कलीसियाओं तक पहुँचाता है।
सुसमाचार प्रचारक – बीच वाली उंगली के समान है जो सबसे लम्‍बा है और इस कारण सब से दूर भी जाता है। प्रचारक यीशु मसीह के सुसमाचार को जगत के छोर छोर तक पहुँचाता है।
रखवाला अर्थात पास्‍टर – अंगूठी की उंगली के समान है जिसका रिश्‍ता स्‍थानीय कलीसिया से है। वह स्‍थानीय कलीसिया का अगुवा है, जो कलीसिया की सुधि रखता है और वचन की शिक्षा और सेवा के कार्य में उनकी अगुवाई करता है।
उपदेशक या शिक्षक – वचन की शिक्षा देते है।
इनके अलावा स्‍थानीय कलीसिया में ही कई सेवकाई के क्षेत्र होते है जिसमें विश्‍वासयोग्‍य व्‍यक्तियों की नियुक्ति कलीसिया के अगुवे प्रार्थना पूर्वक करते है। उदाहरण के लिए हम देखते है प्रेरित 6 में जब एक समस्‍या उठी तो प्रेरितों ने कुछ सेवकों के चयन और नियुक्ति के द्वारा उसका निवारण कर दिया।
हमें अपने अपने तोडों (वरदानों) को समझकर जैसे जैसे प्रभु अवसर देता है वैसे वैसे पूरी आधीनता और नम्रता के साथ प्रभु की सेवा में लगे रहना चाहिए।
परमेश्‍वर ने कलीसिया में हर एक को सेवा हेतु अलग अलग वरदान दिये है, और हर एक के लिये स्‍थान और सेवा दोनो निर्धारित किया है। जिस प्रकार शरीर के अलग अलग अंगों का अपना स्‍थान और कार्य होता है, वैसे ही हर एक विश्‍वासी का भी कलीसिया में जो प्रभु यीशु मसीह का देह है अपना अपना स्‍थान और सेवकाई है। लेकिन सब सेवाओं का नियंत्रण सर से अर्थात प्रभु यीशु मसीह से ही है। (1कुरु 12:1 2-30)
क्योंकि जैसे हमारी एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही सा काम नहीं। वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं। और जब कि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न भिन्न बरदान मिले हैं, तो जिस को भविष्यद्वाणी का दान मिला हो, वह विश्वास के परिमाण के अनुसार भविष्यद्वाणी करे। यदि सेवा करने का दान मिला हो, तो सेवा में लगा रहे, यदि कोई सिखानेवाला हो, तो सिखाने में लगा रहे। जो उपदेशक हो, वह उपदेश देने में लगा रहे; दान देनेवाला उदारता से दे, जो अगुआई करे, वह उत्साह से करे, जो दया करे, वह हर्ष से करे। (रोम 12:4-8)